Happy Independence Day

1203_Indian-Tricolor

वो रात याद है क्या ? नहीं किसी को भी नहीं
जो आज़ादी के बाद आए, कम से कम उनको तो नहीं
वो रात जिसकी सुबह कभी हुई नहीं
वो रात जिसकी काली स्याही कभी मिटी नहीं
वो रात जो गम और खुशियाँ एक साथ लाई थी
वो रात जो उस दर्द में खुद भी रोई थी
उस रात की लकीरें सिर्फ़ ज़मीनों पर नहीं थी
उस रात आस्था राम में कहीं, रहिमों में कहीं थी
वो रात जब एक बाप की बेटी खो गई थी
वो रात जब एक मुसलमां की तुलसी पराई हो गई थी
उस रात हर हिंदू अपने मुसलमां दोस्त को तरसा था
वो रात जब राम उस अल्लाह के साथ को तरसा था
वो रात जो काली ना रही, रंगी हुई लाल थी
वो रात जो याद आती है, ज़िंदगी के बुरे ख्याल सी
वो रात जब जुबाँ इंसान की पहचान बन गई
उस रात हज़ारों ज़िंदगियाँ कटारों तलवारों की मेहमान बन गई
वो रात जो सबको खोखला कर गई
वो रात जो आज़ादी के साथ तबाह कर गई
वो रात रोई उसके आँसूं भी लाल थे
वो रात जिसने उठाए मज़हब पर सवाल थे
वो रात जिसको सब आज़ादी की मानते है
उस रात का दर्द बस कुछ ही जानते हैं
वो रात थी बंटवारे की, ओढ़े हुए चादर आज़ादी की
वो रात थी जीने मरने की, प्यार की बर्बादी की
उस रात एक हिंदू और एक मुसलमान बना था
उस रात एक भारत और एक पाकिस्तान बना था

Image Credit: thehansindia.com

 

 

 

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बंजारा

word press
एक सुनसान से घर में
एक तकिया और चादर के साथ रहता हूँ
कोई नहीं होता आस पास
लोगों के सिर्फ जिस्म इधर उधर घूमते नज़र आते हैं
परछाइयाँ भी हैं उनकी
लेकिन बात नहीं करती
रोज उस तकिये को पकड़ कर
चादर में लिपट कर
अपने अंदर बैठे अकेलेपन से
बात करने की कोशिश करता हूँ
रूठ जाता है वो भी कई बार
और बाहर आने की कोशिश करता है
जलाता है मेरा लहू अंदर ही अंदर
मगर बाहर सबको मेरा खोखला शरीर
एक इंसान के जैसे ही नज़र आता है
किवाड़ खोलते – बंद करते रहता हूँ
कि लोगों के आने जाने जैसा आभास हो
जान बूझ कर बर्तन ज़मींन पर पटक देता हूँ
कि मेरी इस खाली गुमसुम ज़िंदगी में थोड़ी आवाज़ हो
बालकनी के कोने में बैठकर सामने खड़े पेड़ों से
उनका हाल चाल पूछ लेता हूँ
ये सोचकर कि वही तो हैं
जिनकी वजह से अब तक ज़िंदा हूँ
रोज़ आसमान की चित्रकारी और
चाँद तारों के नक़्शे देखते-देखते सो जाता हूँ
कोई नहीं हैं यहाँ,
बस दीवारें, दूर तक पसरी हुई ख़ामोशी
और एक बिखरा हुआ-सा मैं
यही ज़िंदगी है हम बंजारों की
कोई ठिकाना नहीं और कोई अपना नहीं

सुनो, मैं यहीं रहूँगी…..

sunoसुनो,
मैं यहीं रहूँगी
तुम जब मुड़कर देखोगे
यहीं, मुस्कुराती हुई
तुम्हारे जाने का गम छुपाती हुई

मगर, तुम बस मुड़कर देखना
वापस नहीं आना
जो तुम पाने जा रहे हो
वो छोड़कर नहीं आना

कोई बात नहीं, जब थक जाओगे
तो महसूस करना, मैं वहीँ होऊंगी
साथ लिए हमारी हंसी की किलकारियाँ

कोई बात नहीं, जब डर लगने लगे
रुकना, आँखें बंद करना
मैं तुम्हारे साथ ही चल रही होऊंगी
बनती तुम्हारी रेखाओं की कलाकारियाँ

कोई बात नहीं, जब हार जाओगे
दूर तक ढूँढना मुझे
मैं खुश होकर
मना रही होऊंगी तुम्हारी मेहनत को

कोई बात नहीं, अगर बेरंग लगे दुनिया
आसमान की तरफ देखना
हमारे प्यार के रँगों से मैं
सजा रही होऊंगी जन्नत को

और हाँ, जब मन भर जाए
तो लौट आना मेरी बाहों में
फिर से
जीने अपनी ज़िंदगी
हमारी ज़िंदगी
जो हमने बुनी थी
हाथ में हाथ डालकर
चलते हुए ज़िंदगी की राहों में

सुनो, मैं यहीं रहूँगी
मुस्कुराती हुई
तुम्हारा इंतज़ार करुँगी…..

सच

truthसच क्या है?
वो जो हमें दिखाई देता है?
नहीं!
तो फिर वो जो हम अपने कानों से सुनते हैं?
नहीं!
सच एक अहसास है
जो हमारा दिल महसूस करता है
एक भरोसा है
वो जो हमारा दिमाग दूसरों पर करता है
एक ख्वाब है
जो झूठ को भी सच बनाता है
एक रिश्ता है
जो हर सच के साथ एक झूठ भी अपनाता है
सच वो है जो हमें पता नहीं कि सच है
बस आँखें बंद करो
और जो तुम्हे सबसे पहले महसूस हो
उसी को सच मान लेना
क्योंकि अगर ढूंढने निकले
तो हो सकता है भगवान मिल जाए
मगर सच के साथ जी रहे इंसान नहीं मिलेंगे
तो बेहतर क्या है
सच मानकर झूठ के साथ जीना
या सच की तलाश में
अपनी ज़िंदगी खो देना
इसका जवाब तुम्हारे ही अंदर है
ये सच की आवाज तुम्हारे ही अंदर है
छोड़ दो कुछ पल सच को खोजना
क्योंकि जो सच तुम्हें चाहिए वो तुम्हारे ही अंदर है

Image credit: http://www.barabbas.com

माँ

माँ, हम तो हैं बच्चे तेरे,
अक्ल के कच्चे थोड़े
दिल के हैं सच्चे बड़े
सर मुसीबत जो आन पड़े
सब से तू फिर लड़ पड़े
हम तो हैं बच्चे तेरे
हमारे ही लिए तू यह सब करे
तेरे लिए यह शब्द मेरे
विकल्प हो जो पास मेरे,
छू के मैं ये पग तेरे,
जी लू सारे लम्हें मेरे।
साये में तेरे हम पले,
साया ही तेरा हम बने,
संग रहें हम बस तेरे,
दुआएं रब से यह करें
माँ, हम तो हैं बच्चे तेरे

याद होगा तुझे जीती थी जब मैं,
जीताया था मुझे बस तेरी ही लगन ने।
जीती हूँ जब भी,
जीत बड़ी हो या छोटी,
तू ही थी मेरी सफलता की कुँजी,
जाता है श्रेय तुझको,
तू जो हमेशा मेरे साथ है होती।

माँ तेरी हर बात दिल छू जाती है,
एक प्यारी सी मुस्कान जो तेरे चेहरे पर आती है,
हमारी तो दुनिया में जैसे बहार आ जाती है।
जैसे ही तेरा हाथ सर पर पड़ता है,
मेरी दुनिया रंगीन हो जाती है।
तू जो राह दिखाती है,
मंज़िले आसान हो जातीं हैं,
इस ज़िंदगी में माँ, तेरी भूमिकाएं बहुत हैं,
हम पर तेरे एहसान बहुत है,
कोई जो पूछे मुझसे मेरी पहचान,
मेरी माँ का नाम बहुत है।

चलो कलाकार बन जाता हूँ

आज भी डांट पड़ी घर वालों से
मेरा रिजल्ट जो आया था
पांच में से तीन विषयों में बस
एक तिहाई नंबर आया था
बोल रहे थे तेरे बस का क्या है ?
ना पढता है, ना ही तेरे पास कोई कला है
जवाब दे जरा, क्या ऐसे किसी का जीवन चला है?
मैंने भी सोचा हाँ यार,बात तो सही है
मेरे पास पढ़ाई, स्पोर्ट्स,डांस, म्यूजिक कुछ नहीं है
तो उस बेईज्ज़ती ने मुझे झिंझोड़ कर बोला
मेरे दिमाग के बंद दरवाज़ों को खोला
कि अब तो घर वालों का मुँह बंद करवाना पड़ेगा
चाहे कुछ हो ना हो, कुछ तो बन कर दिखाना पड़ेगा
मैंने अपनी डायरी निकाली
और जितनी भी संभावनाएं थी सब उसपे लिख डाली
कि मैं क्या कर सकता हूँ, मैं क्या बन सकता हूँ
सबसे ऊपर सबसे सरल काम लिखा था
पढ़ाई! जो असल में सरल ना था
बचपन से आज तक की सारी किताबें आँखों के सामने आ गईं
और अपना दिया हुआ दर्द फिर से याद दिला गई
डर के मारे पढ़ाई, विचार से बाहर हो गया
और अगला विचार कुछ बनने का तैयार हो गया
सोचा कोई अच्छी आदत लगा लेता हूँ
कोई हारमोनियम, तानपुरा,गिटार बजा लेता हूँ
तारें हाथों में चुभने लगीं थी,
तो दी दिखाई अपनी आगे की ज़िंदगी
मेरी उंगलियां खून से लपालप थी और भीड़ के कान भी
ऐसा बेसुरा गा रहा था कि जान निकल गई थी बेचारी तान की
वो भी प्लान कैंसिल हो गया, तो सोचा स्पोर्ट्समैन बनूँगा
घर वालों का ही नहीं, देश का नाम रोशन करूँगा
कबड्डी में चलो दो दो हाथ कर लेते हैं
मगर 9th क्लास में टूटी हड्डियां आज भी दर्द देते हैं
ना भाई!! तुमसे न हो पायेगा,आवाज़ जोर से दिमाग में गुंजी
तुम ना कर सकते कुछ, दुनिया वाले बजायेंगे तुम्हारी पुंगी
तो दुःख से भरा दिल मेरा कागज़ कलम ले आया
और मेरे अंदर का दर्द कागज़ पर उतर आया
कागज़ पर बिखरे शब्द जोर जोर से चिल्ला रहे थे
कागज़ कलम सब मुझे कलाकार बता रहे थे
उस दिन शुरुआत हुई, मेरा नया संसार बन गया
और ये बेकार, एक कवि आख़िरकार बन गया

पंक्तियाँ भावनाओं से भरी।

वो चंद पंक्तियाँ मेरी भावनाओं से भरी,
आज भी मेरे भीतर ज़िन्दा हैं,
जो एक रोज़ मेरे लफ्जों पर आते आते रह गयी,
तेरे चहरे की वो मासूम मुस्कुराहट
आज भी मेरे जज़्बातों पर भारी है
कोशिश की थी मैंने भी पूरी
तुझको अपना बनाने की
पर मेरी बदक़िस्मती अपना रंग दिखा गयी।
याद है मुझे तेरा दबे पांव आना
कभी मेरे पीछे छिप जाना
तो कभी कभी छिप के सताना।
दोष तो तेरा भी नहीं जो तुझको बोल पाता
तितली थी पकड़ी मैंने
आख़िर कब तक
उन मासूम पंखों को
अपनी उंगलियों में दबोच पाता।
रेत की तरह निकली हाथों से,
रह गयी मेरी बातों में,
मेरे कमजोर जज़्बातों में,
कर भी क्या पाता,
उन बेबस हालातों में।
मेरी ज़िन्दगी की कहानी में
एक ज़िक्र तेरा भी होगा
शुरुआत तेरे बगैर थी
अंत भी तेरे बगैर ही होगा।
लेकर तेरा नाम,
मेरी हर एक शाम,
हर एक सांस में,
ये मेरा इश्क़ ज़िंदा है,
वो चंद पंक्तियाँ मेरी भावनाओं से भरी,
आज भी मेरे भीतर ज़िन्दा हैं।

कविता ही क्यूँ!?

कविता ही क्यूँ,
उसने मुझसे पूछा,
और भी तो तरीके हैं – इज़हार करने के,
क्या ज़वाब देता, तेरी खूबसूरती के आगे,
सब फ़ीके हैं!?
और फिर कविता का पर्याय तेरा नाम ही तो याद आता है,
एक पंक्ति होती नहीं पूरी कि,
तेरा ख्याल दूसरी ले आता है।
एक मायाजाल तेरी नज़रों का,
मुझे डुबोता चला जाता है,
तेरे चेहरे की हर मुस्कुराहट,
मेरे इज़हार-ऐ-इश्क़ का सबूत है,
तुझसे की हर बेपरवाही का,
मेरी कविताओं को गुरूर है,
जवाबदेही भी उनकी, मेरा क्या क़सूर है?
कविता ही क्यूँ? अरे! यही तो मेरी मोहब्बत का सबूत है!

आज़ादी

freedom
दर्द जो तूने दिया कितना गहरा उतरा सीने में
ना ख़ुशी रही ना हसीं रही तब एक पल भी जीने में
कितनी बेबसी से रोई ये आँखें, तेरे दिए जख्मों पे
कितने दूर तक चलती मैं साथ तेरे, इन थके हारे क़दमों से
रूह जो सहम सी गई थी प्यार के ही नाम से
दिल भी निकला ही नहीं तेरे दिए दर्द के इनाम से
बिखरी थी पल पल मैं यूँ, की खुद से खुद को डर था
कभी खरोंच भी दे दूँ खुदको, दिल मेरा इतना पत्थर था
खून कहाँ था ज़िस्म में, श्वास कहाँ कुछ बाकी था
ज़िंदा हूँ मैं अब भी, मुझे ये अहसास ज़रा ही था
पर अब निकली हूँ समंदर से, सब बोझ मैंने बहा दिया
टूटी बिखरी मैंने खुद का,एक नया जहां बना लिया
चाहे मैं हूँ अधूरी, पर अंदर से सिमटी हूँ
किसी और की नहीं ज़रूरत, मैं खुद के लिए कीमती हूँ
जीने का अब अहसास हो रहा है,हर पल नया खास हो रहा है
खुद को पाकर फिर से, मैं हूँ खुद में ये विश्वास हो रहा है
Pic credit: willowcreeksa.co.za

 

इश्क़

जिस्मों के मिलने का इंतज़ार नहीं करती मोहब्बत
रूह के धागे हाथ में आते ही परवान चढ़ जाती है
डूब कर तुझमें खुद को पा लेता हूँ जब
तब जाकर  मेरी आशिक़ी मोहब्बत कहलाती है
और जब दिल की मानकर, सिर तेरे आगे झुक जाता है
मेरी इश्क़ की हर आयत इबादत बन जाती है
तेरी पलकों से टूटे आँसूं जब मेरा दामन भिगोते हैं
उस नमीं को अपनी पलकों में संभालना मेरी आदत बन जाती है
लब खामोश जुबां गुमनाम, मगर शोर बहुत होता है
तब सिर्फ तेरी निग़ाहें मेरी निग़ाहों से बतयाती है
कानों के पास महसूस होती है एक मीठी सी सरगम
तेरी आती जाती साँसें कई दास्ताँ गुनगुनाती है
तेरी ठंडी उँगलियों की छुअन जब मेरे हाथों को जलाती है
तब तेरी मुतासिर होकर ज़िंदगी, ज़िंदगी की तरह मुस्कुराती है