बदलाव का कारवां…

रुकना – बदलना, बदलकर रुक जाना,
और फिर बदल जाना,
बदलाव की यही रही है दास्तां।
जो भी है आता, वो वापस भी है जाता,
कोई भी स्थिर नहीं है रह पाता।

इंसानो की जो बात करुँ,
बदला हर व्यक्ति, बदला है ये समां,
बदली है ज़मीं या बदला आसमां,
दिल हैं बदले, दिमाग़ हैं बदले,
बदला है सारा संसार,
बदलाव है संकट विकट,
विकट है इसका प्रभाव।

भूत का मोह ही कुछ ऐसा,
सिखा दे जो तुझको सारे दाव,
षड़यंत्र है यह वक़्त का,
जो थमा दे तेरे पाँव।

वक़्त के झोकों से पनपता है बदलाव,
आंधी सा भड़कता और तूफ़ान सा
उबलता है बदलाव,
आग में धधकता और पानी में छलकता है बदलाव।
तो कभी घने अन्धकार में
प्रकाश की एक किरण है बदलाव,
ठहरे पानी में एक तरंग है बदलाव,
समय का हर पल है बदलाव,
प्रेम, ईर्श्या, लोभ, मोह, छल-कपट है बदलाव,
आप हैं बदलाव मैं हूं बदलाव,
कण-कण में है बदलाव।

बदलाव ही एकमात्र स्थिरता है,
बाक़ी सब तो मात्र मिथ्या है।

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