चली है ज़िन्दगी न जाने किस ओर,
पहुंचा हूँ कहीं और, और शायद
जाना था कहीं और,
क्या मक़सद है तेरा,

छुपे हुए राज़ खोल दे तू आज
जाने किस तरफ़ जाना है,
न हि कोई दिशा, और न हि कोई,
ठीकाना है,

क्या कुछ कर के दिखाना है?
या बस यूहिं चलते ही जाना है…
सोचता था मैं कि जी रहा हूँ, तभी
एक रोज़ पता चला की,
कट रही थी ये ज़िंदगी…

छलावा है वक़्त का या सच्चाई भी है?
ठहरी है ज़िंदगी,
रुकने की नाक़ामयाब क़ोशिश,
बेबसी के असीम सागर में,
बदलती है,

चाहे राह कोई हो, चलना ही है,
और चल पड़े जिस राह पर,
मुड़ कर न पीछे देखना,
बस आगे की ही सोचना,
चल पड़ेगी यह ज़िंदगी,

क़िस्मतो का खेल नहीं,
भूमि है ये अब कर्म की,
जाना न हो जिस राह पे, उस पर भी,
चलकर तो देख,
मुस्कुरा देगी ये ज़िन्दगी,
तू ज़रा क़ोशिश कर के तो देख,

उद्देश्य ही सब कुछ नहीं होता,
दुसरो की ख़ुशी का भी ख्याल कर,
न ज़िंदगी से अब तू,
कुछ सवाल कर,

मक़सद नहीं बता रहा,
बस बता रहा हूँ, आगे की राह,
चलना जहाँ चाहेगा, तुझे
रोक न कोई पायेगा,

क़ामयाबी मिले या न मिले तुझे चलना आ जायेगा,
लड़खड़ाने से अब तू ख़ुद को बचा पायेगा,
जो तू चलता जायेगा ज़िंदगी जीता चला जायेगा।
जो तू चलता जायेगा ज़िंदगी जीता चला जायेगा।

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