शिकायतें बहुत हैं ज़िंदगी से।

  शिकायतें बहुत हैं ज़िंदगी से, बस मिलता नहीं तो कोई सुनने वाला, उलझने बहुत हैं ज़िंदगी में, बस मिलता नही तो कोई सुलझाने वाला। चोट देने वाले तो बहुत हैं इस दुनिया में, बस नहीं है तो मरहम लगाने वाला, वादे करने वाले बहुत हैं, नहीं है तो वादे निभाने वाला। जान निकालने वाले…

जानना चाहता हूँ मैं।

  क्यूँ किसी की मासूमियत एक अभिशाप है, क्यों मेरा फायदा दूसरे का नुकसान है, क्यूँ कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता, क्यूँ हर कोई अपना ही भला है चाहता। जानना चाहता हूँ मैं कि क्यों मैं ऐसा कर रहा हूँ, बदलना चाहिए मुझे और आशा सबसे कर रहा हूँ। बस ख़ुश रहने के…

औरत का निशान

वो एक उजड़ा हुआ मकान था शायद कई सालों से वीरान था मैंने जैसे ही पहले किवाड़ को धकेला उसने मेरे सामने पूरे घर का मुख खोला जाले लगे हुए थे, मकड़ियाँ घर बसाए हुए थी छेद हो रखे थे फर्श में, चिटियाँ महल सजाए हुए थी धूल की परत हर जगह, एक चादर जितनी…

परछाई

  मैं तेरी कोख की सीप में पली नौ महीनों में जाकर सच्चा मोती बनी मेरे जन्म पर मैंने तेरा रूप जो लिया और हुई मैं तेरी तरह , तेरा दुध जो पीया मैं बड़ी हुई तेरे सपनों की कुँजी बन गई मेरी जिंदगी तेरी जिंदगी भर  की पूँजी बन गई मैं तेरी आँखों में…

अजनबी या अपने

  मैं कहाँ फंस गई हूँ भंवर में सब है मगर वो खास नहीं शब्द अब सिर्फ़ शब्द रह गए इन बातों में अब वो भाव नहीं है उदास मन, ना प्यार का अहसास रहा मैं थी जिसके करीब, अब वो ना मेरे पास रहा कहाँ जाऊं इस जान को लेकर साथ छोड़ना अपना आता…

इश्क : एक मर्ज

  नाराजगी इन पलों की हमसे कुछ इतनी है साहिब कि हमें हमारा ही नाम याद नहीं है , हाथ तो उठते हैं खुदा की इबादत में मगर जो वो मुक्म्मल करे ऐसी हमारी फरियाद नहीं है । वो हुस्न के सौदागर थे बस मुस्कुरा कर लूट लिया हमें , और हमें देखिए, कितना लुटाया…

याद आती हैं वो बातें

बचपन के खेल, लड़कपन के झगड़े, एक दूसरे का हाथ पकड़े, निकल पड़ते थे, सुबह-सुबह अपने-अपने घरों से, गली में दिनभर अनेक तरीकों से, खूब ऊधम मचाया करते थे, याद आती हैं वो बातें, जब सब कुछ भूल जाया करते थे। मौसम थे सैट, सब खेलों के, जाते थे, हम भी कभी मेलों में, पड़ते…

जब ज़िंदगी करवटें बदलती है।।

  कर दिया है शुरू, बदलना करवटें ज़िन्दगी ने, चाहती है, मसलना तख़्त को पलटना, अपने अंदाज़ से। अँधेरा, करके आँखों के आगे उम्मीद करती है, दिखेगा, मुझे इस धूल के भी आगे। धूल से उठा तूफ़ान, चुप्पी लगी ज़ुबान, सफलता मांगती हो जैसे लगान। हवाएं लाना चाहतीं हैं, बेजान पत्तो में जान। दिखाकर अपनी…

रूबरू

है तू नहीं अब रूबरू हूं मैं नहीं अब रूबरू हैं हम नहीं, हो तुम नहीं बस अक्श है अब रूबरू मैं चलूं छूने उसे हाथों से सोचूं कि अब छू ही लूं पर है नहीं कोई सच यहां बस अक्श है अब रूबरू हूं तलाशती हर वजूद को उस जान को अब ढूंढ लूं…