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है तू नहीं अब रूबरू
हूं मैं नहीं अब रूबरू
हैं हम नहीं, हो तुम नहीं
बस अक्श है अब रूबरू
मैं चलूं छूने उसे हाथों से
सोचूं कि अब छू ही लूं
पर है नहीं कोई सच यहां
बस अक्श है अब रूबरू
हूं तलाशती हर वजूद को
उस जान को अब ढूंढ लूं
मगर कुछ नहीं उस राख में
बस अक्श है अब रूबरू
अश्कों की धारा में
है लिखा तेरा नाम यूं
रो-रो के भी ना पढ़ सकूं
बस अक्श है अब रूबरू
है पढ़ती ये लकीरें हाथ की
जो तू मिले तो मैं बनूं
मगर थामूं कहां उस हाथ को
बस अक्श है अब रूबरू
है किताब एक ये जिंदगी
बस उमर भर पढ़ती रहूं
मैं जी लूंगी हर सांस-सांस
ये अक्श जो है तेरा रूबरू|

Picture taken from: http://www.youtube.com
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