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बचपन के खेल, लड़कपन के झगड़े,
एक दूसरे का हाथ पकड़े,
निकल पड़ते थे,
सुबह-सुबह अपने-अपने घरों से,
गली में दिनभर अनेक तरीकों से,
खूब ऊधम मचाया करते थे,
याद आती हैं वो बातें,
जब सब कुछ भूल जाया करते थे।

मौसम थे सैट, सब खेलों के,
जाते थे, हम भी कभी मेलों में,
पड़ते थे छोटे-छोटे झमेलों में,
चाट-पकोड़ी खाते थे गली के ठेलों से।
कंचों का जो मौसम आता,
ढ़ेरों कंचे खरीद कर लाते थे,
कल्ली-जोटा, पिल-चोट में सारा दिन बिताते थे,
याद आतीं हैं वो बातें,
जब दिन भर शोर मचाते थे।
लट्टू की रस्सी पड़ती छोटी,
नाड़े से काम चलाते थे,
लट्टू में कील गाड़ने के चक्कर में,
इंजीनियर बन जाते थे,
सुन्न जो लट्टू करना होता,
कील मोड़ते जाते थे,
हनुमान जन्तरी, तोता जन्तरी फिर सबको हम दिखलाते थे।

वो दिन भी बड़े निराले थे,
हम अपनी चाल के मतवाले थे।
छुपम-छुपाई की जो बात आती,
ढूंढ़ किसी को न पाते थे,
याद आतीं हैं वो बातें जब हम घर में ही छिप जाते थे।

रात जो होती बिजली जाती,
फिर गज़ब का शोर मचाते थे,
घरों से बाहर आकर दोस्तों को बुलाते थे,
चोर-पुलिस की भागादौड़ी में हम जीतकर आते थे।
पोसम्पा-भई-पोसम्पा भी गाते थे,
लंगड़ी-टांग, छु-अछूत में मज़े बड़े आते थे,
याद आतीं हैं वो बाते जब,
पकड़म-पकड़ाई खेल खेल के,
थक बड़े हम जाते थे,

मेहमान जो हमारे घर पर आते,
खुश हम हो जाते थे,
दस रुपए का नोट लेकर, खुद को राजा पाते थे।
कुछ समझ ना पाते थे, इसलिए मुस्कुराते थे,
याद आतीं हैं वो बातें जब हम भी लड़कपन में चिल्लाते थे।

अब तो मूक हम ऐसे हो गए,
मानो समझ समझ के नासमझ हो गए,
बड़प्पन में बौराये ऐसे,
की बचपन का मोल भूल गए।
याद आतीं हैं वो बातें,
जब हम भी कभी बच्चे थे,
ना चिंता थी वर्तमान की,
ना चिंता थी भविष्य की,
दिल के बड़े हम सच्चे थे,
जब हम भी कभी बच्चे थे।

Picture taken from: i1os.com  
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