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मैं कहाँ फंस गई हूँ भंवर में
सब है मगर वो खास नहीं
शब्द अब सिर्फ़ शब्द रह गए
इन बातों में अब वो भाव नहीं
है उदास मन, ना प्यार का अहसास रहा
मैं थी जिसके करीब, अब वो ना मेरे पास रहा
कहाँ जाऊं इस जान को लेकर
साथ छोड़ना अपना आता नहीं है
और मैं बहुत हिस्सों में बँटी हुई हूँ
सिर्फ मुझसे ही मेरा नाता नहीं है
अंधेरे में चीजें तलाशते हैं जैसे
वैसे मैं अपनों को ढूँढ रही हूँ
अनजान हुए अपनों की भीड़ में
अपनों का पता पूछ रही हूँ
भटकी हूँ किस नगरी में
क्रोध की ज्वाला तपती है
तिल-तिल मरती हूँ हर साँस
पर आँख ना आंसू झरती है
एक स्वर-सा गूंजता है दिमाग में
चल कहीं ओर ठिकाना ढूँढ ले
घूमा दे घड़ी की सुईयाँ पीछे
फिर वो बीता हुआ जमाना ढूँढ ले|

Picture taken from: www.mymodernmet.com 
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