इश्क : एक मर्ज

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नाराजगी इन पलों की हमसे कुछ इतनी है साहिब
कि हमें हमारा ही नाम याद नहीं है ,
हाथ तो उठते हैं खुदा की इबादत में
मगर जो वो मुक्म्मल करे ऐसी हमारी फरियाद नहीं है ।
वो हुस्न के सौदागर थे बस मुस्कुरा कर लूट लिया हमें ,
और हमें देखिए, कितना लुटाया खुद को उन पर इस बात का भी हिसाब नहीं है ।
सवाल बड़े किया करते थे वो हमसे मुहब्ब़्त की पढ़ाई के ,
मगर जहाँ जवाब लिखे होंगे हमने
आज वो हमारे पास किताब नहीं है ।
जुल्फ़ों के चिलमन के पीछे छिपकर उनकी नशीली आँखें बतियाती थी बहुत,
मगर कहर देखिए वक्त का कि अब हमारी आँखों में उनके ख्वाब नहीं है ।
अरे! बहुत रो लिए उनके इंतजार और सुकून-ए-दिल की चाहत में ,
अब जान गए हम भी कि इस इश्क के मर्ज का कोई इलाज़ नहीं है ।

Picture taken from: www.quietwaterscp.com 
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