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वो एक उजड़ा हुआ मकान था
शायद कई सालों से वीरान था
मैंने जैसे ही पहले किवाड़ को धकेला
उसने मेरे सामने पूरे घर का मुख खोला
जाले लगे हुए थे, मकड़ियाँ घर बसाए हुए थी
छेद हो रखे थे फर्श में, चिटियाँ महल सजाए हुए थी
धूल की परत हर जगह, एक चादर जितनी मोटी थी
घर तो काफी बड़ा था, मगर रसोई थोड़ी छोटी थी
बैठक के दरवाजे पर पाँवों के चित्र बने हुए थे
कोने में कील पर किसी बुजुर्ग के लत्ते टँगे हुए थे
सोने वाले कमरे में धूल चढ़ी तस्वीरें लगी हुई थी
मगर सब में सिर्फ मर्दों की कतारें बनी हुई थी
रसोई में कोई बर्तन नहीं, सिर्फ मिट्टी का चूल्हा था
नमक- मिर्च- तेल- घी का हर डिब्बा खुला था
पूजा के स्थान पर एक हनुमान जी की टेढ़ी मूर्ति थी
और अंतिम कमरा खोला तो जैसे लूटी तिजोरी खुलती थी
मैं लोट चला दिल में टूटे अरमान लिए
उस घर से, बिना औरत का एक निशान लिए
तब समझ आया क्यों उजड़ा वो मकान था
बिन औरत ही वो घर सालों से वीरान था|

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