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शिकायतें बहुत हैं ज़िंदगी से,
बस मिलता नहीं तो कोई सुनने वाला,
उलझने बहुत हैं ज़िंदगी में,
बस मिलता नही तो कोई सुलझाने वाला।
चोट देने वाले तो बहुत हैं इस दुनिया में,
बस नहीं है तो मरहम लगाने वाला,
वादे करने वाले बहुत हैं,
नहीं है तो वादे निभाने वाला।
जान निकालने वाले तो बहुत हैं,
बस नहीं है तो जान डालने वाला,
आखिर क्यूँ न हों मुझे शिकायतें?!
शिकायतें ही होंगी उस समाज में, जहां होगा,
द्वेष और स्वार्थ का बोलबाला।
बोलना सिखा कर, आवाज़ दबा दी,
चलना सिखा कर, बेड़ियाँ लगा दी,
क्यूँ अब मुझको मिलती नहीं शांति,
समाज में फैली है ये जो भ्रान्ति,
शिकायत है मुझे आखिर आती क्यों नही कोई क्रांति?!

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