गैंग्स ऑफ़ वासेपुर

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अंश पल रहा है गर्भ में
लोरियों की जगह गोलियों के गान हैं
ना भगवद गीता, ना ही पुराण है
बस मरने- मारने का प्लान है
वो अभिमन्यु है ,गर्भ में ही सीख रहा है
अपना आने वाला कल उसे अच्छे से दिख रहा है
घड़ी आ गई जन्म की, समय आ गया जंग का
गूंजी धुनें बन्दूक की, रंगा है घर खून के रंग का
वो बढ़ता जा रहा है बंदूकों के खिलौनों के साथ
सीख रहा है सीने में लोहा उतारना
समझ है उसे इन्हीं चीजों की
आता है बस खुनी नगर से दुश्मन को निहारना
लड़कपन में अपने पिता के नाम से खौफ खूब फैला रहा है
हर गली मोहल्ला अब उसके डर से कंपकंपा रहा है
खून के बदले खून और जान की कीमत जान है
दानवता इसका इकलौता धर्म, यही इसका इमान है
यहां से गुजर दो मारते, बाकि की ना गिनती है
बस कोई बीच में ना बोलना यही सबसे विनती है
है ये बड़ा सिरफिरा रोकना-टोकना पसंद नहीं आता
गर बीच में कोई आया तो गुस्सा इसको कम नहीं आता
धांय-धांय करती बंदूकें कानों को बड़ा सुहाती हैं
जब मन किया सुनने का तब एक और जान चली जाती है
दादा को मारने वाला मरा पिता के हाथ से
खो दिया परिवार अपना मगर गया ना अपनी जात से
दिल में भी है दर्द कहीं इस उजड़े बिखरे जीवन का
पर छोड़ ना पाए ये धंधा, सवाल खड़ा यहां प्रण का
बदला ना ले ले खून का तब तक सांस नहीं लेगा
एक और अंश है उसके पीछे फिर भी वो जान देगा
जब खेल ली होली खून की लाल हो गया सारा जहां
अब तो वापस आना था घर, मगर निकल पड़ा वो कहाँ
वो चला खुदा के घर, अब उसका बदला लल्ला लेगा
यही कहता था वो “एक जान है या तो अल्लाह लेगा या मोहल्ला लेगा”
आज ले ली जान मोहल्ले ने, दाग दी दिल में गोलियां
अब उसकी चौखट भी ना बची, जहां बन सकें रंगोलियां

Picture taken from: bollywoodpage3.wordpress.com
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