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है रात काली अँधेरी, बस सुबह के इंतज़ार में
डरती है खुद से ही, पर है खुद से ही प्यार में
लब्ज तलाशती है रात भर, कुछ बातें बनाने को
साथी ढूंढती है रात भर, कुछ राज़ सुनाने को
बटोरती है सामान ये, इस कालिख की प्यास बुझाने को
मांगती है रंग नया सा, इसे रंगीन बनाने को
हर दुआ पहुंचती है उस रब तक, सुबह को लाने को
है मांगती एक भीख वो, सूरज की रौशनी पाने को
करती हैं दुआएं असर उसकी और सूरज आ गिरता है झोली में
खो जाती है रात कहीं दूर चमक में, रंग-बिरंगी सी रंगोली में
कहीं दबी-दबी सी सुनती है किलकारियाँ उन परिंदों की
स्तब्ध रह जाती है देख कर हरकतें बाशिंदों की
भागता हुआ ये दिन फिर मिल जाता है शाम में
और फिर से रात नज़र आती है हर पिघले-पिघले ज़ाम में
है अश्क़ बहाती फिर मिलती है खुद से रात नाराज़ सी
और फिर जानती है सच जीवन का, एक बात पते और राज़ की
ये जीवन है आधा-अधूरा, जो रात ना होगी दिन के साथ
रौशनी की है कीमत तभी, जब अँधेरे का हो अहसास

Picture taken from: chainimage.com
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