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मैं ढूँढ़ता हूँ सच कहीं और सच कहीं और है
मैं देखता हूँ तेरी परछाई कहीं, मगर अक्ष कहीं और है
मैं रास्तों की दूरियों से मंजिल की कीमत नापता हूँ
मेरे दिल की परेशानियों से आग मैं तापता हूँ
मैं गुनगुनाता हूँ लब्ज दो, भूले पलों की याद में
मैं हर दफा एक नया आसरा तलाशता हूँ
मैं क्यूँ फ़िदा हूँ हर सच की सूरत पर
क्यूँ नहीं झूठ को अपना लेता हूँ
जब आवाज़ आती है दिल से, तू लड़ने के लिए बना है
मैं मुस्कुरा कर उसकी हाँ में हाँ मिला लेता हूँ
दिमाग खिल्ली उड़ाने लगता है मेरे दिल के ज़ज़्बातों की
हँसता है कि दिल नादान हैं
ज़िन्दगी की बड़ी सच्चाई से अनजान है
मैं सच को जी रहा हूँ मगर उसे झूठ समझता हूँ
मैं किसी सच की खोज में नहीं ,
मैं सिर्फ एक झूठ को तरसता हूँ

Picture taken from: http://www.chobirdokan.com
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