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शमशान के मुर्दों की तरह सोए हुए हैं हम
किसी नासमझ बच्चे की तरह खोए हुए हैं हम
खामोशियों में भी चीखती रातों के गुलाम
हर अश्क़ अब खून के रोए हुए हैं हम
है गुजरती जिस तरफ से ये हवा मनचली
सूखे पत्ते की तरह बस पीछे चल पड़े
जहां रुख मुड़ गया इस बहती नदी का
बेकाबू से तिनके की तरह खींचे चल पड़े
ना बन पाए वो चट्टान कभी
जिसे कोई जोर हिला ना सके
ना छू पाए वो मुकाम कभी
जिसे चाह कर भी कोई भुला ना सके
रेत की शक्ल जैसे भी नहीं
कि सबको अपने अंदर समा लें
उड़ते-बिखरे वो बीज भी नहीं
कि कहीं जाकर नया बसेरा बसा लें
दिन के सूरज का रंग तो दूर
हम शाम की धुंधली रोशनी भी नहीं
सितारों के बीच चाँद बनना तो भूल ही जाइये
हम सितारों सी चमकती ओढनी भी नहीं
क्योंकि भूल कर हम वजूद अपना
बस किसी और को मानते रहे
ना खुद ने कभी अपनी राह बनाई
किसी और की राह से मंजिल को पहचानते रहे
खुदाई खो दी खुद ख़ुदा ने हमारे
जो हमारे भीतर कहीं शर्मशार हैं
ये लब्ज जो हम नाकामी के पढ़ते हैं
वही हमारी सबसे बड़ी हार हैं
अब तू भूल जा हर भूत को
एक नया भविष्य बनाने चल दे
तू हौंसला रख अपने अंदर
और एक कामयाब सी नई कहानी गढ़ दे
विश्वास कर अपनी आत्मा पर
कुछ नए रंगों को सजा ले
बाँध के कुछ लब्ज खुद से
और खुद को अपना ख़ुदा बना ले
ये रात-दिन, चाँद-तारे
तेरे साथी बन फिर चल पड़ेंगे
और फिर ये हवाएं, ये नदियाँ
तेरे इशारों से रुख बदलेंगे

Picture taken from: http://www.time2changellc.com
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