एक कविता की रचना

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मैं लिखना चाहती हूँ आज, मगर क्या लिखूं कुछ समझ नहीं आता है
जैसे ही कागज़ पर उतारने लगती हूँ, वो विचार का कीड़ा कहीं खो जाता है
मैं ढूँढती हूँ उसे अपनी ही गहराइयों में डूब-डूब कर, मगर नाकामी नज़र आती है
बहुत मेहनत के बाद भी, कविता की एक पंक्ति नहीं बन पाती है
मैं हर चीज़ को ताकती हूँ पहली सी नज़र से, कोई नया उसके लिए ख्याल आ जाए
क्या पता उसी चीज़ से जुड़े जीवन का, मेरे दिमाग में कोई बवाल आ जाए
जब नहीं खटखटा पाती कोई चीज़ मेरे दिमाग के दरवाजों को,तब मैं पलट कर अपने आप पर आ जाती हूँ
और अपने अंदर भरे कई अनुभवों की एक के बाद एक की ख़ाक छानते जाती हूँ
मैं ताज़ा करती हूँ अपनी बीती  हुई यादों को,
जगाने की कोशिश करती हूँ उन सोये हुए ख्वाबों को,
खोलती हूँ गर्दिले पन्ने, नया करती हूँ पुरानी किताबों को,
और कोशिश करती हूँ, कविता में बाँधने की उन बिखरे अल्फ़ाज़ों को,
फिर रंगती हूँ कागज़ को मैं अपनी कल्पनाओं के रंग से,
और लिखती हूँ कुछ पंक्तियाँ अपने ही अलग ढंग से,
ये बिखरी-बिखरी सी शब्दमालाएँ, कुछ अर्थ अंत में दे जाती हैं
और इस तरह एक आतंरिक युद्ध के बाद, एक छोटी सी कविता बन जाती है

Picture taken from: wallpaperscraft.com
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