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एक पल्लू जो तेरे सिर से फिसल के चल दिया
एक बर्फ का हिस्सा कहीं पिघल के चल दिया
एक लब्ज़ जो तेरे अधरों से शोर सा निकाला
एक हवा का झोंका फिर जोर से चला
एक बूँद जो तेरे आँख से बरसी
एक नदी यूँ सागर की प्यास में तरसी
तू जान खुद को कि तू आग है पानी नहीं
घुट-घुट कर जीना तेरी कहानी नहीं
तू शाम की वो शमा है जो हर परवाने को जला दे
और एक छुअन से सारे दुख-दर्द भुला दे
तू नाजुक-सी मूरत है मिट्टी की,तो वो समझे मूक भी है तू
पर अब है वक़्त बताने का कि चुभने वाला शूक भी है तू
तू आज पहन चूड़ी, कंगन सारा श्रृंगार कर ले
तू मुस्कुरा कर, मुट्ठी में अपनी, सारा संसार कर ले
पर तू क्रोध की सीमा लांघे तो चंडिका, दुर्गा, काली है
तू तांडव कर, तेरा हक़ है, तू हर शिव रूप को जनने वाली है
तू जान खुद को, खुद की तलाश कर ले आज
तू अस्तित्व समझ खुद का, तब ही तो समझेगा समाज
तू बाँध मत खुद को,बिखर जा बारिश की बूंद बनकर
तू बैठ नहीं डर कर,निकल अकेले, काफ़िले-सा जूनून बनकर
शीतल रख अपने मन को, पर आंच ना आये दमन पर
और गर क्षीण करे तेरी पवित्रता कोई, तो दामिनी बन
हुंकार भर सिंहनी की, कालरात्रि का रूप धर ले
और नाश कर पापियों का खून का कटोरा भर ले
बहुत हुई ये पुरुष प्रधानता, होश में आ अब तेरी बारी है
तू कर अपना नाम सार्थक, दिखा दे सबको की तू एक नारी है….

Picture taken from: pinterest
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