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हिस्सों में बँटें हुए लोग
कभी अपनों से अपनों में
कभी अपने ही सपनों में
कभी रंग-रूप के पैमाने में
कभी जाम, कभी मयख़ाने में

हिस्सों में बँटें हुए लोग
कभी बँटें दोस्ती के नाम पर
कभी बिखरे है फाइलों के काम पर
कभी छूटे हैं किसी और के साथ के लिए
कभी भटके हैं अपने से अहसास के लिए

हिस्सों में बँटें हुए लोग
दर्द का सैलाब समेटे हुए हैं
कहीं अपनी ही याद में बैठे हुए हैं
खोये हुए हैं खुद ही से खुद को पाने के लिए
कभी टूटे हैं किसी और से प्यार जताने के लिए

हिस्सों में बँटें हुए लोग
बाहर से एक ही लगते हैं बंद मुट्ठी की तरह
मगर अंदर कैसे ध्वस्त हो रहे, ना जाने वजह
एक युद्ध जो हमेशा चल रहा है भीतर भी
नहीं मिलती ज़िन्दगी, हर पल जी कर भी

हिस्सों में बँट चुके हैं लोग
हिस्सों को चुन रहे हैं लोग
हिस्सों से ना बन सकेंगे लोग
हिस्से ही हैं, हिस्सों में बँटें हुए लोग
हिस्सों में बँटें हुए लोग

Picture taken from: Somos Rc
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