बीता हुआ पल।

    मैं जो उसको पढूँ, जागे मेरे अंदर का जुनूँ, निकल गयी मेरे हाथों से रेत की भाँति, रेत कब है, किसी की मुठ्ठी में टिक पाती। सागर बन तुझको संचित करता खुदमे, चारों ओर मेरे दुनिया होती, और अपनी दुनिया पाता तुझमें। भीनी-भीनी सी ख़ुशबू उसकी, आंसुओं से तर आँखें, दिल ये मेरा…