manwaiting

 

इंतज़ार है किसी का
आने की है आस किसी की,
आँखों के आगे चेहरा किसी का
दिल में है एक प्यास किसी की।
शांति में ये शोर कैसा?
शोर में है शांति,
मेरे जीवन में था वो भोर कैसा
आयी है कैसी शाम भी?।

मैं जो उसको पढूँ,
जागे मेरे अंदर का जुनूँ,
निकल गयी मेरे हाथों से रेत की भाँति,
रेत कब है, किसी की मुठ्ठी में टिक पाती।
सागर बन तुझको संचित करता खुदमे,
चारों ओर मेरे दुनिया होती,
और अपनी दुनिया पाता तुझमें।

भीनी-भीनी सी ख़ुशबू उसकी,
आंसुओं से तर आँखें,
दिल ये मेरा मजनूँ उसके पीछे,
दिमाग़ ने बनायीं सराखें।
दिन-रात का अंतर ना जताता
जब होता मन उससे बतियाता,
उसको, सर-आँखों पर बिठाता,
काश! के उस रोज़,
मैं तुझको रोक पाता।

अतीत की काली गुफ़ा से,
एक सुनहरी रौशनी, बाहर को आये,
बातों ही बातों में, जो तेरा ज़िक्र आये,
इतिहास के पन्ने खुद को,
पढ़ने लग जाएं,
फिर सोचूं मैं आंखें खोल,
क्यूं न उन हसीन लम्हों को
एक बार फिर जिया जाए।
इस दिल को फिर कौन समझाए,
क्यों, बीता हुआ पल कभी लौट कर ना आये।

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