सालों गुज़र गए मुझे, ‘मैं’ बने हुए,
अपने नाम का बोझ लिए हुए,
खुद के आस्तित्व को संभाले,
अपनी ही हाँ में हाँ मिलाते,
खुद से खुद की पहचान हुए,
क्या मैं जान पाया अपने आप को?
यद्यपि(जबकि), सालों गुज़र गए मुझे, ‘मैं’ बने हुए।

क्या है मेरी मंज़िल
क्यूँ हूं इतना मायुस मैं?
बड़ों की सीख लिए साथ में
चलता जा रहा हूं,
अपनी मंज़िल की तलाश में।
क्या है मेरे जन्म का प्रयोजन
मैं करुँ गहन चिंतन मनन,
बस चल रहा हूं अपना ही हाथ अपने हाथ मे थमाये हुए,
आशाएं अपने दिल में समाए हुए,
सालों गुज़र गए मुझे, ‘मैं’ बने हुए।

कौन हूं मैं,
मेरा मकसद क्या है?
यह तो बस मामूली प्रश्न है,
असल प्रश्न तो यह है,
की यह जिज्ञासा कहाँ से आई है।
थक गया हूं, दिलोदिमाग से लड़ते हुए,
सालों गुज़र गए मुझे, ‘मैं’ बने हुए।

 

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