आज़ादी

दर्द जो तूने दिया कितना गहरा उतरा सीने में ना ख़ुशी रही ना हसीं रही तब एक पल भी जीने में कितनी बेबसी से रोई ये आँखें, तेरे दिए जख्मों पे कितने दूर तक चलती मैं साथ तेरे, इन थके हारे क़दमों से रूह जो सहम सी गई थी प्यार के ही नाम से दिल…

इश्क़

जिस्मों के मिलने का इंतज़ार नहीं करती मोहब्बत रूह के धागे हाथ में आते ही परवान चढ़ जाती है डूब कर तुझमें खुद को पा लेता हूँ जब तब जाकर  मेरी आशिक़ी मोहब्बत कहलाती है और जब दिल की मानकर, सिर तेरे आगे झुक जाता है मेरी इश्क़ की हर आयत इबादत बन जाती है…