इश्क़

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जिस्मों के मिलने का इंतज़ार नहीं करती मोहब्बत
रूह के धागे हाथ में आते ही परवान चढ़ जाती है
डूब कर तुझमें खुद को पा लेता हूँ जब
तब जाकर  मेरी आशिक़ी मोहब्बत कहलाती है
और जब दिल की मानकर, सिर तेरे आगे झुक जाता है
मेरी इश्क़ की हर आयत इबादत बन जाती है
तेरी पलकों से टूटे आँसूं जब मेरा दामन भिगोते हैं
उस नमीं को अपनी पलकों में संभालना मेरी आदत बन जाती है
लब खामोश जुबां गुमनाम, मगर शोर बहुत होता है
तब सिर्फ तेरी निग़ाहें मेरी निग़ाहों से बतयाती है
कानों के पास महसूस होती है एक मीठी सी सरगम
तेरी आती जाती साँसें कई दास्ताँ गुनगुनाती है
तेरी ठंडी उँगलियों की छुअन जब मेरे हाथों को जलाती है
तब तेरी मुतासिर होकर ज़िंदगी, ज़िंदगी की तरह मुस्कुराती है
Image Credit: Pexels
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  1. Seema saini says:

    Very nice poem my dear rite…I love it 😘💕

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