कविता ही क्यूँ!?

कविता ही क्यूँ, उसने मुझसे पूछा, और भी तो तरीके हैं – इज़हार करने के, क्या ज़वाब देता, तेरी खूबसूरती के आगे, सब फ़ीके हैं!? और फिर कविता का पर्याय तेरा नाम ही तो याद आता है, एक पंक्ति होती नहीं पूरी कि, तेरा ख्याल दूसरी ले आता है। एक मायाजाल तेरी नज़रों का, मुझे…