कविता ही क्यूँ,
उसने मुझसे पूछा,
और भी तो तरीके हैं – इज़हार करने के,
क्या ज़वाब देता, तेरी खूबसूरती के आगे,
सब फ़ीके हैं!?
और फिर कविता का पर्याय तेरा नाम ही तो याद आता है,
एक पंक्ति होती नहीं पूरी कि,
तेरा ख्याल दूसरी ले आता है।
एक मायाजाल तेरी नज़रों का,
मुझे डुबोता चला जाता है,
तेरे चेहरे की हर मुस्कुराहट,
मेरे इज़हार-ऐ-इश्क़ का सबूत है,
तुझसे की हर बेपरवाही का,
मेरी कविताओं को गुरूर है,
जवाबदेही भी उनकी, मेरा क्या क़सूर है?
कविता ही क्यूँ? अरे! यही तो मेरी मोहब्बत का सबूत है!

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