वो चंद पंक्तियाँ मेरी भावनाओं से भरी,
आज भी मेरे भीतर ज़िन्दा हैं,
जो एक रोज़ मेरे लफ्जों पर आते आते रह गयी,
तेरे चहरे की वो मासूम मुस्कुराहट
आज भी मेरे जज़्बातों पर भारी है
कोशिश की थी मैंने भी पूरी
तुझको अपना बनाने की
पर मेरी बदक़िस्मती अपना रंग दिखा गयी।
याद है मुझे तेरा दबे पांव आना
कभी मेरे पीछे छिप जाना
तो कभी कभी छिप के सताना।
दोष तो तेरा भी नहीं जो तुझको बोल पाता
तितली थी पकड़ी मैंने
आख़िर कब तक
उन मासूम पंखों को
अपनी उंगलियों में दबोच पाता।
रेत की तरह निकली हाथों से,
रह गयी मेरी बातों में,
मेरे कमजोर जज़्बातों में,
कर भी क्या पाता,
उन बेबस हालातों में।
मेरी ज़िन्दगी की कहानी में
एक ज़िक्र तेरा भी होगा
शुरुआत तेरे बगैर थी
अंत भी तेरे बगैर ही होगा।
लेकर तेरा नाम,
मेरी हर एक शाम,
हर एक सांस में,
ये मेरा इश्क़ ज़िंदा है,
वो चंद पंक्तियाँ मेरी भावनाओं से भरी,
आज भी मेरे भीतर ज़िन्दा हैं।

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