opinion

आज भी डांट पड़ी घर वालों से
मेरा रिजल्ट जो आया था
पांच में से तीन विषयों में बस
एक तिहाई नंबर आया था
बोल रहे थे तेरे बस का क्या है ?
ना पढता है, ना ही तेरे पास कोई कला है
जवाब दे जरा, क्या ऐसे किसी का जीवन चला है?
मैंने भी सोचा हाँ यार,बात तो सही है
मेरे पास पढ़ाई, स्पोर्ट्स,डांस, म्यूजिक कुछ नहीं है
तो उस बेईज्ज़ती ने मुझे झिंझोड़ कर बोला
मेरे दिमाग के बंद दरवाज़ों को खोला
कि अब तो घर वालों का मुँह बंद करवाना पड़ेगा
चाहे कुछ हो ना हो, कुछ तो बन कर दिखाना पड़ेगा
मैंने अपनी डायरी निकाली
और जितनी भी संभावनाएं थी सब उसपे लिख डाली
कि मैं क्या कर सकता हूँ, मैं क्या बन सकता हूँ
सबसे ऊपर सबसे सरल काम लिखा था
पढ़ाई! जो असल में सरल ना था
बचपन से आज तक की सारी किताबें आँखों के सामने आ गईं
और अपना दिया हुआ दर्द फिर से याद दिला गई
डर के मारे पढ़ाई, विचार से बाहर हो गया
और अगला विचार कुछ बनने का तैयार हो गया
सोचा कोई अच्छी आदत लगा लेता हूँ
कोई हारमोनियम, तानपुरा,गिटार बजा लेता हूँ
तारें हाथों में चुभने लगीं थी,
तो दी दिखाई अपनी आगे की ज़िंदगी
मेरी उंगलियां खून से लपालप थी और भीड़ के कान भी
ऐसा बेसुरा गा रहा था कि जान निकल गई थी बेचारी तान की
वो भी प्लान कैंसिल हो गया, तो सोचा स्पोर्ट्समैन बनूँगा
घर वालों का ही नहीं, देश का नाम रोशन करूँगा
कबड्डी में चलो दो दो हाथ कर लेते हैं
मगर 9th क्लास में टूटी हड्डियां आज भी दर्द देते हैं
ना भाई!! तुमसे न हो पायेगा,आवाज़ जोर से दिमाग में गुंजी
तुम ना कर सकते कुछ, दुनिया वाले बजायेंगे तुम्हारी पुंगी
तो दुःख से भरा दिल मेरा कागज़ कलम ले आया
और मेरे अंदर का दर्द कागज़ पर उतर आया
कागज़ पर बिखरे शब्द जोर जोर से चिल्ला रहे थे
कागज़ कलम सब मुझे कलाकार बता रहे थे
उस दिन शुरुआत हुई, मेरा नया संसार बन गया
और ये बेकार, एक कवि आख़िरकार बन गया

Image Credit: telegrafi.com
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