बंजारा

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एक सुनसान से घर में
एक तकिया और चादर के साथ रहता हूँ
कोई नहीं होता आस पास
लोगों के सिर्फ जिस्म इधर उधर घूमते नज़र आते हैं
परछाइयाँ भी हैं उनकी
लेकिन बात नहीं करती
रोज उस तकिये को पकड़ कर
चादर में लिपट कर
अपने अंदर बैठे अकेलेपन से
बात करने की कोशिश करता हूँ
रूठ जाता है वो भी कई बार
और बाहर आने की कोशिश करता है
जलाता है मेरा लहू अंदर ही अंदर
मगर बाहर सबको मेरा खोखला शरीर
एक इंसान के जैसे ही नज़र आता है
किवाड़ खोलते – बंद करते रहता हूँ
कि लोगों के आने जाने जैसा आभास हो
जान बूझ कर बर्तन ज़मींन पर पटक देता हूँ
कि मेरी इस खाली गुमसुम ज़िंदगी में थोड़ी आवाज़ हो
बालकनी के कोने में बैठकर सामने खड़े पेड़ों से
उनका हाल चाल पूछ लेता हूँ
ये सोचकर कि वही तो हैं
जिनकी वजह से अब तक ज़िंदा हूँ
रोज़ आसमान की चित्रकारी और
चाँद तारों के नक़्शे देखते-देखते सो जाता हूँ
कोई नहीं हैं यहाँ,
बस दीवारें, दूर तक पसरी हुई ख़ामोशी
और एक बिखरा हुआ-सा मैं
यही ज़िंदगी है हम बंजारों की
कोई ठिकाना नहीं और कोई अपना नहीं
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