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कहो कुछ तो ऐसा कि सुकून मिल जाए
मेरे सोए हुए सपनों को जूनून मिल जाए
याद दिलाओ मुझे फिर से, वो बहादुरी के किस्से
मेरी सूख चुकी रगों को फिर खून मिल जाए

वो वक़्त कहीं पास ही छूटा, जहां हौसला मजबूत था
जहां मेरे शब्दों का अर्थ और मेरा एक वजूद था
बस मुझे फिर से कोई दो कदम पीछे खिंच लो
जहां रख के भूला हूँ हिम्मत, मेरा वो खोया दून मिल जाए
कुछ तो कहो ऐसा कि सुकून मिल जाए

इन थकते कदमों की वजह ढूँढ ना सकूँ
हूँ हर हर दफा घबराया कि कब चलूँ, कब रुकूँ
हो हाथ कोई साथ मेरे आज, मुझे थाम ले
चलते चलते फिर कहीं, अँधेरे दिसंबर से जगमगाता जून मिल जाए
कहो ना कुछ तो ऐसा कि सुकून मिल जाए

खिंचता हूँ हार की चिलम मैं आज हर सांस के साथ
ये जो धुआँ है यहाँ, होता है एक ज़िंदा लाश के जलने के बाद
इस बुझ चुकी आग में कोई चिंगारी बस डाल दो
क्या पता सुलगती एक मुराद मासूम मिल जाए
कुछ तो कहो ऐसा कि सुकून मिल जाए

Image Credit: BDF.com
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