जानना चाहता हूँ मैं।

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क्यूँ किसी की मासूमियत एक अभिशाप है,
क्यों मेरा फायदा दूसरे का नुकसान है,
क्यूँ कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता,
क्यूँ हर कोई अपना ही भला है चाहता।
जानना चाहता हूँ मैं कि क्यों मैं ऐसा कर रहा हूँ,
बदलना चाहिए मुझे और आशा सबसे कर रहा हूँ।
बस ख़ुश रहने के लिए सिसक रहा हूँ,
गम भी तो ज़िन्दगी का एक हिस्सा है
मैं उसे क्यों भूल रहा हूँ।
उदासी कभी जाती नहीं,
खुशियाँ कभी टिक पाती नहीं।
इस चक्रव्यूह में फंसकर,
ज़िंदगी की अहमियत को क्यूँ भूल रहा हूँ।
शांति में भी भयंकर शोर सुन रहा हूँ,
ज़ुबाँ से कुछ, आँखों से कुछ और बोल रहा हूँ,
जानना चाहता हूँ मैं, कि आखिर मैं कर क्या रहा हूँ।

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याद आती हैं वो बातें

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बचपन के खेल, लड़कपन के झगड़े,
एक दूसरे का हाथ पकड़े,
निकल पड़ते थे,
सुबह-सुबह अपने-अपने घरों से,
गली में दिनभर अनेक तरीकों से,
खूब ऊधम मचाया करते थे,
याद आती हैं वो बातें,
जब सब कुछ भूल जाया करते थे।

मौसम थे सैट, सब खेलों के,
जाते थे, हम भी कभी मेलों में,
पड़ते थे छोटे-छोटे झमेलों में,
चाट-पकोड़ी खाते थे गली के ठेलों से।
कंचों का जो मौसम आता,
ढ़ेरों कंचे खरीद कर लाते थे,
कल्ली-जोटा, पिल-चोट में सारा दिन बिताते थे,
याद आतीं हैं वो बातें,
जब दिन भर शोर मचाते थे।
लट्टू की रस्सी पड़ती छोटी,
नाड़े से काम चलाते थे,
लट्टू में कील गाड़ने के चक्कर में,
इंजीनियर बन जाते थे,
सुन्न जो लट्टू करना होता,
कील मोड़ते जाते थे,
हनुमान जन्तरी, तोता जन्तरी फिर सबको हम दिखलाते थे।

वो दिन भी बड़े निराले थे,
हम अपनी चाल के मतवाले थे।
छुपम-छुपाई की जो बात आती,
ढूंढ़ किसी को न पाते थे,
याद आतीं हैं वो बातें जब हम घर में ही छिप जाते थे।

रात जो होती बिजली जाती,
फिर गज़ब का शोर मचाते थे,
घरों से बाहर आकर दोस्तों को बुलाते थे,
चोर-पुलिस की भागादौड़ी में हम जीतकर आते थे।
पोसम्पा-भई-पोसम्पा भी गाते थे,
लंगड़ी-टांग, छु-अछूत में मज़े बड़े आते थे,
याद आतीं हैं वो बाते जब,
पकड़म-पकड़ाई खेल खेल के,
थक बड़े हम जाते थे,

मेहमान जो हमारे घर पर आते,
खुश हम हो जाते थे,
दस रुपए का नोट लेकर, खुद को राजा पाते थे।
कुछ समझ ना पाते थे, इसलिए मुस्कुराते थे,
याद आतीं हैं वो बातें जब हम भी लड़कपन में चिल्लाते थे।

अब तो मूक हम ऐसे हो गए,
मानो समझ समझ के नासमझ हो गए,
बड़प्पन में बौराये ऐसे,
की बचपन का मोल भूल गए।
याद आतीं हैं वो बातें,
जब हम भी कभी बच्चे थे,
ना चिंता थी वर्तमान की,
ना चिंता थी भविष्य की,
दिल के बड़े हम सच्चे थे,
जब हम भी कभी बच्चे थे।

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जब ज़िंदगी करवटें बदलती है।।

 

कर दिया है शुरू, बदलना
करवटें ज़िन्दगी ने,
चाहती है, मसलना
तख़्त को पलटना,
अपने अंदाज़ से।
अँधेरा,
करके आँखों के आगे
उम्मीद करती है,
दिखेगा,
मुझे इस धूल के भी आगे।
धूल से उठा तूफ़ान, चुप्पी लगी ज़ुबान,
सफलता मांगती हो जैसे लगान।
हवाएं लाना चाहतीं हैं,
बेजान पत्तो में जान।
दिखाकर अपनी झूठी शान,
हम भूल गए अपनी ही पहचान।
दिखते थे, सैकड़ों, तारे आकाश में,
कहने को अब भी हैें मौजूद,
बस बादलों ने बदल डाली है अपनी राह,
चेहरे पर चढ़ाई है मैंने,
एक झूठी मुस्कुराहट,
आस है, शायद मुझे भी मिलेगी राहत।
प्यास है, बस मिलता नहीं पानी,
सूखा है गला, हो गया हूँ हताश,
जो बदली मेरी ज़िंदगी,
नहीं बची अब कोई आस,
बह गया जो ये वक़्त,
रेत की भांति हाथों से,
हुई करती थी चंचलता,
मेरी भी बातों में।
ऐ ज़िंदगी तूने मुझे अपना,
असली रंग दिखा दिया।
बचपन को मार कर,
मुझे वयस्क बना दिया,
मुझमें परिवर्तन ला दिया,
करवटें बदलना सीखा दिया,
मतलबी बना दिया,
ऐ ज़िन्दगी तूने मुझे ज़िंदा रखकर भी मुर्दा बना दिया।।

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बदलाव का कारवां…

बदलाव कहूँ या वक़्त का प्रभाव?

रुकना – बदलना, बदलकर रुक जाना,
और फिर बदल जाना,
बदलाव की यही रही है दास्तां।
जो भी है आता, वो वापस भी है जाता,
कोई भी स्थिर नहीं है रह पाता।

इंसानो की जो बात करुँ,
बदला हर व्यक्ति, बदला है ये समां,
बदली है ज़मीं या बदला आसमां,
दिल हैं बदले, दिमाग़ हैं बदले,
बदला है सारा संसार,
बदलाव है संकट विकट,
विकट है इसका प्रभाव।

भूत का मोह ही कुछ ऐसा,
सिखा दे जो तुझको सारे दाव,
षड़यंत्र है यह वक़्त का,
जो थमा दे तेरे पाँव।

वक़्त के झोकों से पनपता है बदलाव,
आंधी सा भड़कता और तूफ़ान सा
उबलता है बदलाव,
आग में धधकता और पानी में छलकता है बदलाव।
तो कभी घने अन्धकार में
प्रकाश की एक किरण है बदलाव,
ठहरे पानी में एक तरंग है बदलाव,
समय का हर पल है बदलाव,
प्रेम, ईर्श्या, लोभ, मोह, छल-कपट है बदलाव,
आप हैं बदलाव मैं हूं बदलाव,
कण-कण में है बदलाव।

बदलाव ही एकमात्र स्थिरता है,
बाक़ी सब तो मात्र मिथ्या है।

यादों का तूफ़ान और आंसुओं की बारिश।

ये यादों का तूफ़ान, ये आंसुओं की बारिश,
बीती बातों को फिर जीने की ख्वाहिश,
इस ख्वाहिश की फरियाद करके,
रोना भी नहीं आता अब तो।
ख़ुशनसीब हैं वो लोग जो रो लेते हैं,
अपनी मर्ज़ी से,
दर्द आ जाता है बाहर आँसू बनकर,
हल्का हो जाता है मन।
मेरा तो कमबख्त दिमाग़ भी कहता है,
रोना भी अब तेरे बस का नहीं,
वो नमकीन पानी तेरी आँखों में नहीं।
घुटन ही है, अब तेरी क़िस्मत में।
ज़िन्दगी का सफ़र आज किस मोड़ पर ले आया है,
जिनको दिल से अपना माना है,
उन्हीं को आज छोड़कर जाना है।
खींचती है यादों की गूँज,
मुझे अपने मायाजाल में,
जैसे पूछती हो मुझसे वो,
एक अपने ही अंदाज़ में,
यार थे, निभा गए वो अपनी यारी|
बंधन है जीवन भर का,
कब आएगी तेरी बारी?
यादों को बयां, किया न जायेगा,
जो बीत गया पल वो लौट के न आएगा,
जो यार मिले बड़ी मन्नतों से,
उनसे बिछड़ना अब सहा न जायेगा।
थम सी गई यह सोच कर मेरी साँस,
न आगे मुझसे कुछ और लिखा जायेगा….

राह…

जब ज़िन्दगी प्रश्न पूछती है, तो आप क्या जवाब देते है?

चली है ज़िन्दगी न जाने किस ओर,
पहुंचा हूँ कहीं और, और शायद
जाना था कहीं और,
क्या मक़सद है तेरा,

छुपे हुए राज़ खोल दे तू आज
जाने किस तरफ़ जाना है,
न हि कोई दिशा, और न हि कोई,
ठीकाना है,

क्या कुछ कर के दिखाना है?
या बस यूहिं चलते ही जाना है…
सोचता था मैं कि जी रहा हूँ, तभी
एक रोज़ पता चला की,
कट रही थी ये ज़िंदगी…

छलावा है वक़्त का या सच्चाई भी है?
ठहरी है ज़िंदगी,
रुकने की नाक़ामयाब क़ोशिश,
बेबसी के असीम सागर में,
बदलती है,

चाहे राह कोई हो, चलना ही है,
और चल पड़े जिस राह पर,
मुड़ कर न पीछे देखना,
बस आगे की ही सोचना,
चल पड़ेगी यह ज़िंदगी,

क़िस्मतो का खेल नहीं,
भूमि है ये अब कर्म की,
जाना न हो जिस राह पे, उस पर भी,
चलकर तो देख,
मुस्कुरा देगी ये ज़िन्दगी,
तू ज़रा क़ोशिश कर के तो देख,

उद्देश्य ही सब कुछ नहीं होता,
दुसरो की ख़ुशी का भी ख्याल कर,
न ज़िंदगी से अब तू,
कुछ सवाल कर,

मक़सद नहीं बता रहा,
बस बता रहा हूँ, आगे की राह,
चलना जहाँ चाहेगा, तुझे
रोक न कोई पायेगा,

क़ामयाबी मिले या न मिले तुझे चलना आ जायेगा,
लड़खड़ाने से अब तू ख़ुद को बचा पायेगा,
जो तू चलता जायेगा ज़िंदगी जीता चला जायेगा।
जो तू चलता जायेगा ज़िंदगी जीता चला जायेगा।