इश्क तेरा मेरा

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पलछिन के पार, हो तेरा-मेरा संसार

चाँद की बाहों में घर हो हमारा

हवाओं के साथ बहते चले हम
सिर्फ हमारा हो सूरज का उजियारा

यहाँ नहीं, किसी दूर जहाँ में हमारा वास हो
जहाँ सिर्फ तू ही मेरे आस-पास हो

और किसी की ज़रुरत ही क्या
जब तुझसे ही मैं पूरी होऊँ
आँखें खोलूं तेरे साये में
और तेरे साये में ही सोऊँ

पढूँ मैं प्यार की कसमें, तेरी लिखी किताब हो
जहाँ तू ही मेरा हर सवाल और तू ही जवाब हो

लिखते जाएँ हम-तुम दोनों
मोहब्ब्त का एक नया अफसाना
मैं तुम्हारा हर ख्वाब बन जाऊँ
और तुम मेरी हर नींद चुराना

ऐसी ही हमारे इश्क में डूबी हर एक रात हो
हर पल तेरी साँसों में उलझी मेरी हर साँस हो

मैं लहर मचलती तुझ तक आऊँ
तू सागर का किनारा हो
हर जुबाँ पर जो रह जाए
ऐसा प्यार हमारा हो

मैं तेरी धरती कहलाऊँ और तू मेरा आकाश हो
हर बार हो मिलन हमारा, जब-जब भी बरसात हो
समंदर की गहराई से गहरा, हमारे प्यार का अहसास हो
कि एक नहीं, फिर सौ-सौ जन्मों तक तेरा-मेरा साथ हो

Picture taken from: best.enjob.ru
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मेरे गाँव की शाम

6896419098_c51308a9d7_bमैं शाम को बैठती हूँ जब
मेरे घर के बाहर वाले आंगन में
तब अहसास होता है कि
मैं रहती हूँ एक गाँव में
पड़ोसी के ऊँचें घर की
सबसे ऊँचीं मुँडेर पर
पंख फैलाता एक मोर बैठा है
एक पूरा कोना घेर कर
निहार रहा है खूबसूरती को
इस संध्या में डूबे गाँव के
देख रहा है रात रूपी दुल्हन को
सजते सँवरते इस छाँव में
हर घर में उगे मगर आसमान में फैले
पेड़ हवा के साथ बतिया रहे हैं
दोपहर की धूप में झुलसने के बाद
शाम की मरहम को सरहा रहे हैं
गली से गुजर रही हैं औरतें
सिर पर कूड़े की परात लिए
कोई बहू खड़ी है दरवाजे पर
अपने सास-ससूर की बात लिए
वो है बताने को उतावली
उस पर जो गुजरी है सारे दिन में
और दिल उसका हल्का होता जाता है
जैसे-जैसे छिपता है सूरज पश्चिम में
मेरी माँ लाती है दूध जिसके घर से
वो यूँ ही थोड़ा ज्यादा डाल देती है
यहाँ घर से बाहर जाती हर औरत
पड़ोसन पर अपने घर की जिम्मेदारी टाल देती है
मैं खुश हूँ कि मुझे कोई शाम
इस गाँव में जीने को मिलती है
हर शाम यहाँ गलियों में जो
एक राज़ की बात खुलती है
बस डर है एक ही बात का
कि बदल ना जाए ये गाँव
कहीं विकास बना ना दे
इसे गाँव की जगह शहर की एक शाम

Picture taken from:twitter.com

दोस्ती में जुदाई

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मुस्कुराते, खेलते
एक-दूजे को छेड़ते
यूँ ही कुछ पल हमारी झोली में आ गए
दिवाली के दीए थे
या होली में पीए थे
सब रंग हमारे आसमां पर ऐसे ही छा गए
वो बर्थडे का केक
चाहे Mid Sem ब्रेक
सब हमारे लिए यादें बुन रहे थे
थी गुंज जो हँसी की
लय वो खुशी की
सब पंछी हम जैसे सुन रहे थे
हम गा रहे थे गीत
जो बनकर मनमीत
वो शब्द भी खुद ही लिखते रहे
शायद हमें पता था
कि होना है तू क्या
पर झूठ के पीछे छिपते रहे
हम चल रहे थे राह पर
एक परदा था निगाह पर
ना था ख्याल कि अकेले चलना भी होगा
सात हम साथ थे
हाथों में हाथ थे
ना रही खबर कि बिछड़ना भी होगा
मगर सच है अब सामने
कि जिंदगी की राह में
हमें हमेशा चलना ही होगा
और यारों तुम्हें सताने को
तुम्हारी बातें बताने को
किसी ओर से मिलना ही होगा|

Picture taken from: magic.piktochart.com 

तेरे जाने के बाद

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तू जो गया छोड़ के
ये जिंदगी थम सी गई
तू चला किस  ओर कि
ये आँखें नम हो गई
साँसें चले ना जाने कैसे
बस जपती माला तेरे नाम की
है ना कोई पता मेरा
धड़कन हुई गुमनाम सी
है याद मुझे वो हर एक पल
जो रह गया मेरी रुह में
बस तू फिर मिले कभी यहाँ
तो जिंदगी बीते सुकून में
मैं ना रहूँ जिंदा अगर
तो समझ लेना एक बात तुम
ये जुदाई हमारे प्यार में
है कर गई जहाँ से गुम
खिलखिलाती उस चाँदनी की
तुम्हें है कसम मेरे साथिया
कभी तोड़ना ना वो रिश्ता
जो दिलों ने हमारे बना लिया
मैं रहूँ या तुम रहो
इस जीवन की जंग में
हूँ मैं बसी हो तुम बसे
एक-दूजे के अंग-अंग में|

Picture taken from: www.theodysseyonline.com

शिकायतें बहुत हैं ज़िंदगी से।

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शिकायतें बहुत हैं ज़िंदगी से,
बस मिलता नहीं तो कोई सुनने वाला,
उलझने बहुत हैं ज़िंदगी में,
बस मिलता नही तो कोई सुलझाने वाला।
चोट देने वाले तो बहुत हैं इस दुनिया में,
बस नहीं है तो मरहम लगाने वाला,
वादे करने वाले बहुत हैं,
नहीं है तो वादे निभाने वाला।
जान निकालने वाले तो बहुत हैं,
बस नहीं है तो जान डालने वाला,
आखिर क्यूँ न हों मुझे शिकायतें?!
शिकायतें ही होंगी उस समाज में, जहां होगा,
द्वेष और स्वार्थ का बोलबाला।
बोलना सिखा कर, आवाज़ दबा दी,
चलना सिखा कर, बेड़ियाँ लगा दी,
क्यूँ अब मुझको मिलती नहीं शांति,
समाज में फैली है ये जो भ्रान्ति,
शिकायत है मुझे आखिर आती क्यों नही कोई क्रांति?!

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जानना चाहता हूँ मैं।

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क्यूँ किसी की मासूमियत एक अभिशाप है,
क्यों मेरा फायदा दूसरे का नुकसान है,
क्यूँ कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता,
क्यूँ हर कोई अपना ही भला है चाहता।
जानना चाहता हूँ मैं कि क्यों मैं ऐसा कर रहा हूँ,
बदलना चाहिए मुझे और आशा सबसे कर रहा हूँ।
बस ख़ुश रहने के लिए सिसक रहा हूँ,
गम भी तो ज़िन्दगी का एक हिस्सा है
मैं उसे क्यों भूल रहा हूँ।
उदासी कभी जाती नहीं,
खुशियाँ कभी टिक पाती नहीं।
इस चक्रव्यूह में फंसकर,
ज़िंदगी की अहमियत को क्यूँ भूल रहा हूँ।
शांति में भी भयंकर शोर सुन रहा हूँ,
ज़ुबाँ से कुछ, आँखों से कुछ और बोल रहा हूँ,
जानना चाहता हूँ मैं, कि आखिर मैं कर क्या रहा हूँ।

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औरत का निशान

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वो एक उजड़ा हुआ मकान था
शायद कई सालों से वीरान था
मैंने जैसे ही पहले किवाड़ को धकेला
उसने मेरे सामने पूरे घर का मुख खोला
जाले लगे हुए थे, मकड़ियाँ घर बसाए हुए थी
छेद हो रखे थे फर्श में, चिटियाँ महल सजाए हुए थी
धूल की परत हर जगह, एक चादर जितनी मोटी थी
घर तो काफी बड़ा था, मगर रसोई थोड़ी छोटी थी
बैठक के दरवाजे पर पाँवों के चित्र बने हुए थे
कोने में कील पर किसी बुजुर्ग के लत्ते टँगे हुए थे
सोने वाले कमरे में धूल चढ़ी तस्वीरें लगी हुई थी
मगर सब में सिर्फ मर्दों की कतारें बनी हुई थी
रसोई में कोई बर्तन नहीं, सिर्फ मिट्टी का चूल्हा था
नमक- मिर्च- तेल- घी का हर डिब्बा खुला था
पूजा के स्थान पर एक हनुमान जी की टेढ़ी मूर्ति थी
और अंतिम कमरा खोला तो जैसे लूटी तिजोरी खुलती थी
मैं लोट चला दिल में टूटे अरमान लिए
उस घर से, बिना औरत का एक निशान लिए
तब समझ आया क्यों उजड़ा वो मकान था
बिन औरत ही वो घर सालों से वीरान था|

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परछाई

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मैं तेरी कोख की सीप में पली
नौ महीनों में जाकर सच्चा मोती बनी
मेरे जन्म पर मैंने तेरा रूप जो लिया
और हुई मैं तेरी तरह , तेरा दुध जो पीया
मैं बड़ी हुई तेरे सपनों की कुँजी बन गई
मेरी जिंदगी तेरी जिंदगी भर  की पूँजी बन गई
मैं तेरी आँखों में छिपी हुई नरमाई हूँ
माँ, मैं तेरी परछाई हूँ

तेरा गुरूर, गर्व, स्वाभिमान हूँ मैं
जानती हूँ तेरी जिंदगी, जान हूँ मैं
तेरा लहू मेरी रगों में दौड़ रहा है
तू जो पाई-पाई मेरे लिए जोड़ रहा है
तेरा मकसद मेरी हर ज़रुरत पूरा करना है
और मेरे देखे हर सपने में रंग भरना है
मैं तेरे कानों में हर पल गुँजती शहनाई हूँ
पिता, मैं तेरी परछाई हूँ

मेरी उंगली पकड़ कर जो तूने चलना सिखाया था
मेरे जन्म पर जैसे तेरा बचपन मुस्कुराया था
मेरा हाथ पकड़ कर तू जैसे काम करवाती थी
स्कूल में मेरे हिस्से की डाँट भी तू खाती थी
तुझसे ही सीखा हर लब्ज़, हर कहानी मैंने
तेरे साये में ही जीयी है जिंदगानी मैंने
मैं सिर्फ तेरी बहन नहीं, तेरा भाई हूँ
दीदी, मैं तेरी परछाई हूँ

तुझमें दादी का शांत स्वभाव छिपा है
पापा जैसा हँसी-ठिठोली का चाव छिपा है
माँ के दिए संस्कारों की मूरत है तू
दीदी की समझदारी की सूरत है तू
मेरे बचपने को तूने अपने अंदर समेटा है
सबकी नज़रों में तू अच्छा बेटा है
और तू दुनिया का सबसे अच्छा भाई है
हाँ, तू हम सबकी परछाई है|

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अजनबी या अपने

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मैं कहाँ फंस गई हूँ भंवर में
सब है मगर वो खास नहीं
शब्द अब सिर्फ़ शब्द रह गए
इन बातों में अब वो भाव नहीं
है उदास मन, ना प्यार का अहसास रहा
मैं थी जिसके करीब, अब वो ना मेरे पास रहा
कहाँ जाऊं इस जान को लेकर
साथ छोड़ना अपना आता नहीं है
और मैं बहुत हिस्सों में बँटी हुई हूँ
सिर्फ मुझसे ही मेरा नाता नहीं है
अंधेरे में चीजें तलाशते हैं जैसे
वैसे मैं अपनों को ढूँढ रही हूँ
अनजान हुए अपनों की भीड़ में
अपनों का पता पूछ रही हूँ
भटकी हूँ किस नगरी में
क्रोध की ज्वाला तपती है
तिल-तिल मरती हूँ हर साँस
पर आँख ना आंसू झरती है
एक स्वर-सा गूंजता है दिमाग में
चल कहीं ओर ठिकाना ढूँढ ले
घूमा दे घड़ी की सुईयाँ पीछे
फिर वो बीता हुआ जमाना ढूँढ ले|

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इश्क : एक मर्ज

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नाराजगी इन पलों की हमसे कुछ इतनी है साहिब
कि हमें हमारा ही नाम याद नहीं है ,
हाथ तो उठते हैं खुदा की इबादत में
मगर जो वो मुक्म्मल करे ऐसी हमारी फरियाद नहीं है ।
वो हुस्न के सौदागर थे बस मुस्कुरा कर लूट लिया हमें ,
और हमें देखिए, कितना लुटाया खुद को उन पर इस बात का भी हिसाब नहीं है ।
सवाल बड़े किया करते थे वो हमसे मुहब्ब़्त की पढ़ाई के ,
मगर जहाँ जवाब लिखे होंगे हमने
आज वो हमारे पास किताब नहीं है ।
जुल्फ़ों के चिलमन के पीछे छिपकर उनकी नशीली आँखें बतियाती थी बहुत,
मगर कहर देखिए वक्त का कि अब हमारी आँखों में उनके ख्वाब नहीं है ।
अरे! बहुत रो लिए उनके इंतजार और सुकून-ए-दिल की चाहत में ,
अब जान गए हम भी कि इस इश्क के मर्ज का कोई इलाज़ नहीं है ।

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