शिकायतें बहुत हैं ज़िंदगी से।

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शिकायतें बहुत हैं ज़िंदगी से,
बस मिलता नहीं तो कोई सुनने वाला,
उलझने बहुत हैं ज़िंदगी में,
बस मिलता नही तो कोई सुलझाने वाला।
चोट देने वाले तो बहुत हैं इस दुनिया में,
बस नहीं है तो मरहम लगाने वाला,
वादे करने वाले बहुत हैं,
नहीं है तो वादे निभाने वाला।
जान निकालने वाले तो बहुत हैं,
बस नहीं है तो जान डालने वाला,
आखिर क्यूँ न हों मुझे शिकायतें?!
शिकायतें ही होंगी उस समाज में, जहां होगा,
द्वेष और स्वार्थ का बोलबाला।
बोलना सिखा कर, आवाज़ दबा दी,
चलना सिखा कर, बेड़ियाँ लगा दी,
क्यूँ अब मुझको मिलती नहीं शांति,
समाज में फैली है ये जो भ्रान्ति,
शिकायत है मुझे आखिर आती क्यों नही कोई क्रांति?!

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जानना चाहता हूँ मैं।

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क्यूँ किसी की मासूमियत एक अभिशाप है,
क्यों मेरा फायदा दूसरे का नुकसान है,
क्यूँ कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता,
क्यूँ हर कोई अपना ही भला है चाहता।
जानना चाहता हूँ मैं कि क्यों मैं ऐसा कर रहा हूँ,
बदलना चाहिए मुझे और आशा सबसे कर रहा हूँ।
बस ख़ुश रहने के लिए सिसक रहा हूँ,
गम भी तो ज़िन्दगी का एक हिस्सा है
मैं उसे क्यों भूल रहा हूँ।
उदासी कभी जाती नहीं,
खुशियाँ कभी टिक पाती नहीं।
इस चक्रव्यूह में फंसकर,
ज़िंदगी की अहमियत को क्यूँ भूल रहा हूँ।
शांति में भी भयंकर शोर सुन रहा हूँ,
ज़ुबाँ से कुछ, आँखों से कुछ और बोल रहा हूँ,
जानना चाहता हूँ मैं, कि आखिर मैं कर क्या रहा हूँ।

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औरत का निशान

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वो एक उजड़ा हुआ मकान था
शायद कई सालों से वीरान था
मैंने जैसे ही पहले किवाड़ को धकेला
उसने मेरे सामने पूरे घर का मुख खोला
जाले लगे हुए थे, मकड़ियाँ घर बसाए हुए थी
छेद हो रखे थे फर्श में, चिटियाँ महल सजाए हुए थी
धूल की परत हर जगह, एक चादर जितनी मोटी थी
घर तो काफी बड़ा था, मगर रसोई थोड़ी छोटी थी
बैठक के दरवाजे पर पाँवों के चित्र बने हुए थे
कोने में कील पर किसी बुजुर्ग के लत्ते टँगे हुए थे
सोने वाले कमरे में धूल चढ़ी तस्वीरें लगी हुई थी
मगर सब में सिर्फ मर्दों की कतारें बनी हुई थी
रसोई में कोई बर्तन नहीं, सिर्फ मिट्टी का चूल्हा था
नमक- मिर्च- तेल- घी का हर डिब्बा खुला था
पूजा के स्थान पर एक हनुमान जी की टेढ़ी मूर्ति थी
और अंतिम कमरा खोला तो जैसे लूटी तिजोरी खुलती थी
मैं लोट चला दिल में टूटे अरमान लिए
उस घर से, बिना औरत का एक निशान लिए
तब समझ आया क्यों उजड़ा वो मकान था
बिन औरत ही वो घर सालों से वीरान था|

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परछाई

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मैं तेरी कोख की सीप में पली
नौ महीनों में जाकर सच्चा मोती बनी
मेरे जन्म पर मैंने तेरा रूप जो लिया
और हुई मैं तेरी तरह , तेरा दुध जो पीया
मैं बड़ी हुई तेरे सपनों की कुँजी बन गई
मेरी जिंदगी तेरी जिंदगी भर  की पूँजी बन गई
मैं तेरी आँखों में छिपी हुई नरमाई हूँ
माँ, मैं तेरी परछाई हूँ

तेरा गुरूर, गर्व, स्वाभिमान हूँ मैं
जानती हूँ तेरी जिंदगी, जान हूँ मैं
तेरा लहू मेरी रगों में दौड़ रहा है
तू जो पाई-पाई मेरे लिए जोड़ रहा है
तेरा मकसद मेरी हर ज़रुरत पूरा करना है
और मेरे देखे हर सपने में रंग भरना है
मैं तेरे कानों में हर पल गुँजती शहनाई हूँ
पिता, मैं तेरी परछाई हूँ

मेरी उंगली पकड़ कर जो तूने चलना सिखाया था
मेरे जन्म पर जैसे तेरा बचपन मुस्कुराया था
मेरा हाथ पकड़ कर तू जैसे काम करवाती थी
स्कूल में मेरे हिस्से की डाँट भी तू खाती थी
तुझसे ही सीखा हर लब्ज़, हर कहानी मैंने
तेरे साये में ही जीयी है जिंदगानी मैंने
मैं सिर्फ तेरी बहन नहीं, तेरा भाई हूँ
दीदी, मैं तेरी परछाई हूँ

तुझमें दादी का शांत स्वभाव छिपा है
पापा जैसा हँसी-ठिठोली का चाव छिपा है
माँ के दिए संस्कारों की मूरत है तू
दीदी की समझदारी की सूरत है तू
मेरे बचपने को तूने अपने अंदर समेटा है
सबकी नज़रों में तू अच्छा बेटा है
और तू दुनिया का सबसे अच्छा भाई है
हाँ, तू हम सबकी परछाई है|

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अजनबी या अपने

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मैं कहाँ फंस गई हूँ भंवर में
सब है मगर वो खास नहीं
शब्द अब सिर्फ़ शब्द रह गए
इन बातों में अब वो भाव नहीं
है उदास मन, ना प्यार का अहसास रहा
मैं थी जिसके करीब, अब वो ना मेरे पास रहा
कहाँ जाऊं इस जान को लेकर
साथ छोड़ना अपना आता नहीं है
और मैं बहुत हिस्सों में बँटी हुई हूँ
सिर्फ मुझसे ही मेरा नाता नहीं है
अंधेरे में चीजें तलाशते हैं जैसे
वैसे मैं अपनों को ढूँढ रही हूँ
अनजान हुए अपनों की भीड़ में
अपनों का पता पूछ रही हूँ
भटकी हूँ किस नगरी में
क्रोध की ज्वाला तपती है
तिल-तिल मरती हूँ हर साँस
पर आँख ना आंसू झरती है
एक स्वर-सा गूंजता है दिमाग में
चल कहीं ओर ठिकाना ढूँढ ले
घूमा दे घड़ी की सुईयाँ पीछे
फिर वो बीता हुआ जमाना ढूँढ ले|

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इश्क : एक मर्ज

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नाराजगी इन पलों की हमसे कुछ इतनी है साहिब
कि हमें हमारा ही नाम याद नहीं है ,
हाथ तो उठते हैं खुदा की इबादत में
मगर जो वो मुक्म्मल करे ऐसी हमारी फरियाद नहीं है ।
वो हुस्न के सौदागर थे बस मुस्कुरा कर लूट लिया हमें ,
और हमें देखिए, कितना लुटाया खुद को उन पर इस बात का भी हिसाब नहीं है ।
सवाल बड़े किया करते थे वो हमसे मुहब्ब़्त की पढ़ाई के ,
मगर जहाँ जवाब लिखे होंगे हमने
आज वो हमारे पास किताब नहीं है ।
जुल्फ़ों के चिलमन के पीछे छिपकर उनकी नशीली आँखें बतियाती थी बहुत,
मगर कहर देखिए वक्त का कि अब हमारी आँखों में उनके ख्वाब नहीं है ।
अरे! बहुत रो लिए उनके इंतजार और सुकून-ए-दिल की चाहत में ,
अब जान गए हम भी कि इस इश्क के मर्ज का कोई इलाज़ नहीं है ।

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याद आती हैं वो बातें

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बचपन के खेल, लड़कपन के झगड़े,
एक दूसरे का हाथ पकड़े,
निकल पड़ते थे,
सुबह-सुबह अपने-अपने घरों से,
गली में दिनभर अनेक तरीकों से,
खूब ऊधम मचाया करते थे,
याद आती हैं वो बातें,
जब सब कुछ भूल जाया करते थे।

मौसम थे सैट, सब खेलों के,
जाते थे, हम भी कभी मेलों में,
पड़ते थे छोटे-छोटे झमेलों में,
चाट-पकोड़ी खाते थे गली के ठेलों से।
कंचों का जो मौसम आता,
ढ़ेरों कंचे खरीद कर लाते थे,
कल्ली-जोटा, पिल-चोट में सारा दिन बिताते थे,
याद आतीं हैं वो बातें,
जब दिन भर शोर मचाते थे।
लट्टू की रस्सी पड़ती छोटी,
नाड़े से काम चलाते थे,
लट्टू में कील गाड़ने के चक्कर में,
इंजीनियर बन जाते थे,
सुन्न जो लट्टू करना होता,
कील मोड़ते जाते थे,
हनुमान जन्तरी, तोता जन्तरी फिर सबको हम दिखलाते थे।

वो दिन भी बड़े निराले थे,
हम अपनी चाल के मतवाले थे।
छुपम-छुपाई की जो बात आती,
ढूंढ़ किसी को न पाते थे,
याद आतीं हैं वो बातें जब हम घर में ही छिप जाते थे।

रात जो होती बिजली जाती,
फिर गज़ब का शोर मचाते थे,
घरों से बाहर आकर दोस्तों को बुलाते थे,
चोर-पुलिस की भागादौड़ी में हम जीतकर आते थे।
पोसम्पा-भई-पोसम्पा भी गाते थे,
लंगड़ी-टांग, छु-अछूत में मज़े बड़े आते थे,
याद आतीं हैं वो बाते जब,
पकड़म-पकड़ाई खेल खेल के,
थक बड़े हम जाते थे,

मेहमान जो हमारे घर पर आते,
खुश हम हो जाते थे,
दस रुपए का नोट लेकर, खुद को राजा पाते थे।
कुछ समझ ना पाते थे, इसलिए मुस्कुराते थे,
याद आतीं हैं वो बातें जब हम भी लड़कपन में चिल्लाते थे।

अब तो मूक हम ऐसे हो गए,
मानो समझ समझ के नासमझ हो गए,
बड़प्पन में बौराये ऐसे,
की बचपन का मोल भूल गए।
याद आतीं हैं वो बातें,
जब हम भी कभी बच्चे थे,
ना चिंता थी वर्तमान की,
ना चिंता थी भविष्य की,
दिल के बड़े हम सच्चे थे,
जब हम भी कभी बच्चे थे।

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जब ज़िंदगी करवटें बदलती है।।

 

कर दिया है शुरू, बदलना
करवटें ज़िन्दगी ने,
चाहती है, मसलना
तख़्त को पलटना,
अपने अंदाज़ से।
अँधेरा,
करके आँखों के आगे
उम्मीद करती है,
दिखेगा,
मुझे इस धूल के भी आगे।
धूल से उठा तूफ़ान, चुप्पी लगी ज़ुबान,
सफलता मांगती हो जैसे लगान।
हवाएं लाना चाहतीं हैं,
बेजान पत्तो में जान।
दिखाकर अपनी झूठी शान,
हम भूल गए अपनी ही पहचान।
दिखते थे, सैकड़ों, तारे आकाश में,
कहने को अब भी हैें मौजूद,
बस बादलों ने बदल डाली है अपनी राह,
चेहरे पर चढ़ाई है मैंने,
एक झूठी मुस्कुराहट,
आस है, शायद मुझे भी मिलेगी राहत।
प्यास है, बस मिलता नहीं पानी,
सूखा है गला, हो गया हूँ हताश,
जो बदली मेरी ज़िंदगी,
नहीं बची अब कोई आस,
बह गया जो ये वक़्त,
रेत की भांति हाथों से,
हुई करती थी चंचलता,
मेरी भी बातों में।
ऐ ज़िंदगी तूने मुझे अपना,
असली रंग दिखा दिया।
बचपन को मार कर,
मुझे वयस्क बना दिया,
मुझमें परिवर्तन ला दिया,
करवटें बदलना सीखा दिया,
मतलबी बना दिया,
ऐ ज़िन्दगी तूने मुझे ज़िंदा रखकर भी मुर्दा बना दिया।।

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रूबरू

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है तू नहीं अब रूबरू
हूं मैं नहीं अब रूबरू
हैं हम नहीं, हो तुम नहीं
बस अक्श है अब रूबरू
मैं चलूं छूने उसे हाथों से
सोचूं कि अब छू ही लूं
पर है नहीं कोई सच यहां
बस अक्श है अब रूबरू
हूं तलाशती हर वजूद को
उस जान को अब ढूंढ लूं
मगर कुछ नहीं उस राख में
बस अक्श है अब रूबरू
अश्कों की धारा में
है लिखा तेरा नाम यूं
रो-रो के भी ना पढ़ सकूं
बस अक्श है अब रूबरू
है पढ़ती ये लकीरें हाथ की
जो तू मिले तो मैं बनूं
मगर थामूं कहां उस हाथ को
बस अक्श है अब रूबरू
है किताब एक ये जिंदगी
बस उमर भर पढ़ती रहूं
मैं जी लूंगी हर सांस-सांस
ये अक्श जो है तेरा रूबरू|

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बदलाव का कारवां…

बदलाव कहूँ या वक़्त का प्रभाव?

रुकना – बदलना, बदलकर रुक जाना,
और फिर बदल जाना,
बदलाव की यही रही है दास्तां।
जो भी है आता, वो वापस भी है जाता,
कोई भी स्थिर नहीं है रह पाता।

इंसानो की जो बात करुँ,
बदला हर व्यक्ति, बदला है ये समां,
बदली है ज़मीं या बदला आसमां,
दिल हैं बदले, दिमाग़ हैं बदले,
बदला है सारा संसार,
बदलाव है संकट विकट,
विकट है इसका प्रभाव।

भूत का मोह ही कुछ ऐसा,
सिखा दे जो तुझको सारे दाव,
षड़यंत्र है यह वक़्त का,
जो थमा दे तेरे पाँव।

वक़्त के झोकों से पनपता है बदलाव,
आंधी सा भड़कता और तूफ़ान सा
उबलता है बदलाव,
आग में धधकता और पानी में छलकता है बदलाव।
तो कभी घने अन्धकार में
प्रकाश की एक किरण है बदलाव,
ठहरे पानी में एक तरंग है बदलाव,
समय का हर पल है बदलाव,
प्रेम, ईर्श्या, लोभ, मोह, छल-कपट है बदलाव,
आप हैं बदलाव मैं हूं बदलाव,
कण-कण में है बदलाव।

बदलाव ही एकमात्र स्थिरता है,
बाक़ी सब तो मात्र मिथ्या है।